जनवरी की गुनगुनी धूप हो और खाने के लिए आम मिल जाये, तब तो मजा ही आ जाये. ये देखिये मेरा आम का पेड़, है तो मेरे जितना छोटा ही पर इसमें हर मौसम में फल लगता है. अभी तो आम कच्चा है पर खाने का मन है तो तोड़ ही लेता हूँ .
आज बहुत दिनों के बाद अच्छी धूप निकली है तो मैंने भी सूरज का चित्र बनाया है. इस कड़ाके की ठण्ड में मैंने इसका बहुत इंतजार किया था. बीस दिनों की छूट्टी के बाद अब कल से स्कूल खुलने वाला है. अगर आज धूप नहीं निकलता तो मेरा स्कूल कल भी नहीं खुलता. मुझे स्कूल जाना अच्छा लगता है . कल सबको न्यू इयर विश भी तो करना है.
ये देखिये गयी मेरी पहली दांत और खुल गयी मेरी दांतों की खिड़की. पता है जब मेरा दांत टूटा तो मैं कितना रोया, इतना ..इतना.. इतना.. जितना की पूरा बीस दांत ही टूट गया हो और अब कभी नहीं आएगा.
अब तो मेरी मुस्कुराहट भी खिड़की वाली हो गयी है. पता है मेरी दादी मेरा क्या नाम रखी है...... पर्वत राज खिड़की वाला, क्योंकि मैं दिन भर बालू में से कंकड़ और पत्थर चुनता हूँ और मेरे दांत में एक खिड़की हो गयी है.
आजकल स्कूल में होमवर्क बहुत मिलता है. तो अपनी मदद के लिए मैंने ये रोबोट बनाया है. इतनी मेहनत से मैंने इसे बनाया है पर लगता है इसका कोई तार छूट गया है क्योंकि ये मेरी कुछ मदद ही नहीं कर रहा. इसको फिर से ठीक करना पड़ेगा .
इस बार जब मैं अपनी नानी के घर मुजफ्फरपुर , बिहार गया तो मैं अपने अंकल के ऑफिस भी गया. वहां उनका चश्मा लगाकर खूब फोटो भी खिचवाया. तभी उनके यहाँ एक और छोटा बच्चा आ गया . पहले तो हम दोनों ने साथ में थोड़ा खेला और फिर जानते हैं क्या हुआ...
कैसा लग रहा हूँ. अच्छा न.
भैया ये चश्मा मुझे दे दो न प्लीज .
स्टाफ अंकल ने मुझसे चश्मा लेकर उसे दे दिया, कहा की वह छोटा है. तो क्या मैं भी तो छोटा ही हूँ और वैसे भी ये मेरे अंकल का है.
गुस्सा ..... इसने मेरा चश्मा ले लिया और स्टाइल में फोटो खिचवा रहा है